आचार्य नरेश शुक्ला
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Saturday, September 12, 2015
मैं सोचता रह गया
रविवार को
बहुत कुछ कहता है
कोई तो है परदे के पीछे
भूलकर भी नहीं रहना है शहर में
हिन्दी
मुझे अच्छा नहीं लगता है
समझ गये होंगे आप बात को
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